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यूपी का एक ऐसा रेस्टोरेंट।

यूपी का एक रेस्टोरेंट जहां आज मिलती है चूल्हे की रोटी।

मुरादाबाद स्पेशल फूड आधुनिकता के दौर में रेस्त्रां और होटल में खान-पान बढ़ता जा रहा है। पुराने होटल संचालक अपनी चेन शुरू करके भोजन खिलाने का काम कर रहे हैं। लेकिन बीते 85 सालों से शहर के अग्रवाल भोजनालय में पुराने हिसाब से भोजन परोसा जा रहा है आधुनिकता के दौर में रेस्त्रां और होटल में खान-पान बढ़ता जा रहा है। पुराने होटल संचालक अपनी चेन शुरू करके भोजन खिलाने का काम कर रहे हैं। लेकिन बीते 85 सालों से शहर के अग्रवाल भोजनालय में पुराने हिसाब से भोजन परोसा जा रहा है।

रोटी का स्वाद लेने के लिए आइए मुरादाबाद।

आधुनिकता के दौर में रेस्त्रां और होटल में खान-पान बढ़ता जा रहा है। पुराने होटल संचालक अपनी चेन शुरू करके भोजन खिलाने का काम कर रहे हैं। लेकिन बीते 85 सालों से शहर के अग्रवाल भोजनालय में पुराने हिसाब से भोजन परोसा जा रहा है गैस की जगह आज भी यहां चूल्हे की गर्म रोटियां ग्राहकों को दी जाती है। भोजनालय में लगभग 17 घंटे तक प्रतिदिन चूल्हा जलता है। इसके साथ ही महज सवा सौ रुपये में भरपेट भोजन कराया जाता है। अलग से रोटी,दाल और सब्जी का कोई चार्ज नहीं लिया जाता है। 85 साल से खान-पान में नहीं किया कोई बदलाव।

जलियां बाला बाग कांड के बाद मुरादाबाद आया परिवार।

बीते 85 सालों से अग्रवाल भोजनालय में अपने खान-पान में कोई परिवर्तन नहीं किया। बुजुर्गाें ने जो विरासत में सौंपा,उसी स्वाद को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इस होटल से शहर के नेता,निर्यातक और कारोबारी भी इस होटल में खाना खाने के लिए आतें हैं। चूल्हें की गर्म रोटियों के सादा शाकाहारी भोजन यहां की पहचान है के दूसरे संचालक नरेश कुमार अग्रवाल ने बताया कि वह मूलरूप से मुरादाबाद के रहने वाले हैं। लेकिन उनके पिता मुरारी लाल अग्रवाल को अमृतसर में उनके रिश्तेदारों ने गोद ले लिया था। साल 1919 में जलिया वाला कांड की सभा में उनके पिता ने प्रतिभाग किया था। लेकिन अंग्रेजों के नरसंहार को देखकर वह काफी सहम गए थे।

इस कांड के एक साल बाद वह साल 1920 में मुरादाबाद आ गए थे। इसके बाद उन्होंने कटरा पूरन जाट मुहल्ले के पैतृक आवास में रहकर कचौरी-पूरी खिलाने का काम शुरू कर दिया था। साल 1940 में उन्होंने स्टेशन रोड के अग्रवाल धर्मशाला में एक दुकान किराए पर ली थी। इसके बाद उन्होंने यहीं पर अग्रवाल भोजनालय का काम शुरू कर दिया था। आज इस होटल का किराया अग्रवाल ट्रस्ट में जमा होता है।

Moradabad special food –

इस दौरान भोजन पकाने के लिए भी वह चूल्हें की लकड़ी का प्रयोग करते हैं। 1100 एक दिन में लगभग एक क्विंटल लकड़ी खर्च हो जाती है रुपये क्विंटल की लकड़ी खरीदने के बाद वह चूल्हा जलाते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि वह गैस का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इससे भोजन की क्वालिटी में फर्क आ सकता है। इसलिए वह भोजन बनाने का पूरा काम चूल्हे में करते हैं।घर के पिसे मसाले ही करते हैं वह कभी बाजार से पिसे हुए मसालों की खरीद नहीं करते हैं। उनके यहां जो भी मसाले खाने में डाले जाते हैं,उन्हें घर में ही पीसा जाता है। भोजन की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए वह यह काम करते हैं। हालांकि मसालों का सभी सामान बाजार से खरीदा जाता है,लेकिन पीसने का काम घर में ही किया जाता है।

उन्होंने कहा कि खाने में उपयोग होने वाला आटा,दाल,चावल,सब्जी की खरीद वह स्वयं करते हैं,ताकि भोजन की गुणवत्ता को बनाकर रखा जा सके।भरपेट भोजन कराने की परंपरा जारी होटल और रेस्त्रां में अक्सर दाल और सब्जी दूसरी बार लेने पर अतिरिक्त चार्ज लिया जाता है। लेकिन अग्रवाल भोजनालय की थाली में सब्जी,रोटी,दाल लेने पर कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लिया जाता है। नरेश कुमार अग्रवाल ने बताया कि होटल में दो तरह की थाली दी जाती है।

जिसमें देशी घी की थाली 160 रुपये में प्रदान की जाती है,जबकि बिना देशी की थाली सवा सौ रुपये में दी जाती है। दोनों थाली लेने पर ग्राहक को भरपेट भोजन दिया जाता है। जब तक ग्राहक का पेट नहीं भर जाता,उसे रोटियां दी जाएगीं। इनकी कोई गिनती नहीं होती है।

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