प्राकृतिक सम्पदा एवं इसका संरक्षण

प्राकृतिक सम्पदा एवं इसका संरक्षण

हमारी पृथ्वी एक वृद्ध पारितंत्र है जो अनेक छोटे-छोटे पारितंत्रो से मिलकर बनी है तथा किसी भी पारितंत्र में जैव समुदाय के सभी जीव अपने क्रियाकलापों के लिए एक दूसरे पर निर्भर होते हैं तथा साथ ही अपने अजैविक  पर्यावरण अर्थात अजैविक पदार्थों से भी जुड़े रहते हैं पृथ्वी पर अजैविक पदार्थों जीवो के द्वारा विभिन्न जैव भू रासायनिक चक्र में घूमते रहते हैं तथा पारितंत्र का संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं मानव भी एक दूसरे जीवधारियों की तरह ही पारितंत्र का एक जैविक घटक है।

प्राकृतिक संपदा या संसाधन

वे पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो या उन्हें उपयोगी उत्पाद में रूपांतरित किया जा सके जिनका प्रयोग किसी उपयोगी वस्तु के निर्माण में किया जा सके संसाधन कहलाते हैं अतः  हम परिभाषित कर सकते हैं । प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन है जो प्रकृति से प्राप्त होते हैं जैसे-: जल, वायु, ऊर्जा, पेड़-पौधे, जीव जंतु, ईंधन, धातु आदि।

प्राकृतिक संसाधनों के प्रकार

प्राकृतिक संसाधन दो प्रकार के होते हैं।

1.क्षयशील संसाधन-: वे प्राकृतिक संसाधन जो अत्यधिक उपयोग में लाने के कारण सीख रहे समाप्त हो रहे हैं अथवा शीघ्र ही समाप्त हो जाएंगे छाया सील संसाधन कहलाते हैं यह प्रकृति में सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं जैसे-: तेल, गैस, कोयला आदि।

2. अक्षयसील संसाधन-: वे प्राकृतिक संसाधन जिनका असीमित उपयोग करने के बाद भी कभी भी समाप्त नहीं होंगे अक्षय सील संसाधन या गैर परंपरागत संसाधन कहलाते हैं उदाहरण-: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भूगर्भिक ताप, ज्वार भाटा आदि।

प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण

पारिस्थितिकी असंतुलन आज हमारे सामने एक विकराल समस्या के रूप में उपस्थित है मानव यह स्पष्ट रूप से जान चुका है कि इस समस्या का समाधान उसके पास उसके विकास में होने वाली वृद्धि की गति कम करके अथवा वृद्धि पर पूर्णतया रोक लगाकर भी संभव नहीं है मानव यह भी स्पष्ट रूप से समझ चुका है कि इस पारिस्थितिकी असंतुलन का एक मुख्य कारण प्राकृतिक संसाधनों का अनियमित व विवेक पूर्ण दोहन है जिसके कारण प्राकृतिक संपदा का विघटन होता जा रहा है इस भीगठन के उपरांत नवीनकरणीय अक्षयसील संसाधन तो हमें फिर से प्राप्त हो  भी सकते हैं परंतु अनवीनकरणीय अक्षयसील संसाधनों का तो अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। अतः भविष्य में ऐसी भी स्थिति आ सकती है अनवीनकरणीय पदार्थों का अकाल तो होगा ही नवीन पदार्थों जिनका प्राकृतिक चक्र में स्वरूप बदलता रहता है बे भी मानव की आवश्यकता अनुसार नहीं बचेंगे ऐसी स्थिति में प्राकृतिक संपदा का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के उपाय

1.वनों की कटाई पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

2. वृक्षारोपण करना चाहिए।

3. राष्ट्रीय उद्योगों की स्थापना करनी चाहिए।

4. उद्योगों मानव बस्तियों, सड़क, आदि को बनो से दूर  रखा जाना चाहिए।

5. सामाजिक वानिकी को बढ़ावा देना चाहिए।

वन्य जीव

वन्यजीव प्राप्त संपदा के रूप में समस्त पृथ्वी पर अवश्य सभी जीव जातियों के लिए अत्यंत आवश्यक है वन्य जीव के विनाश मानव जाति के लिए अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती यदि वन्यजीवों की दोनों प्रकार से घट पादप समुदाय एवं जंतु समुदायों की बात की जाए तो दोनों और एक दूसरे के पूरक होते हैं पादप समुदायों की उपयोगिता आधारभूत स्वरूप के सामने आती है सरल शब्दों में यह दोनों समुदाय एक दूसरे के पूरक तो है परंतु पादप समुदाय ज्यादा उपयोगी है।

वन्य वनस्पति की उपयोगिता

1. पर्यावरण एवं उसका संतुलन बनाए रखना सभी जीवो के लिए उपयोगी है या पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में अत्यंत आवश्यक है पारिस्थितिकी तंत्र में जंतु समुदाय एवं सूक्ष्म जीव वनस्पति के शरण में रहते हैं एवं इसी में उत्पन्न होने वाले विभिन्न पदार्थों का भोजन, आवास आदि के लिए उपयोग करते हैं वायुमंडल में उपस्थित विभिन्न गैसे-जैसे विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड एवं ऑक्सीजन के संतुलन को बनाए रखने में अत्यंत उपयोगी है साथ ही बन पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को समाप्त करने का कार्य भी करते हैं यह जलवायु को प्रभावित करते हैं तथा वर्षा कराने में सहायक है  प्राकृतिक चक्र तथा पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए वनस्पति प्रारंभिक एवं अंतिम पद बनाती है प्राणी तथा जीव जंतु का शुभारंभ वनस्पति पर ही निर्भर होता है खाद्य जाल का प्रमुख उत्पादक अर्थात वनस्पति में ही होता है  इस प्रकार की रासायनिक चक्र को संतुलित रखने के लिए वनस्पति की आवश्यकता प्रारंभ से अंत तक बनी रहती है।

2.  वनों से हमें अनेक उपयोगी वस्तुएं जैसे-: इमारती लकड़ी, गोद, टैनिन, रबड़ आदि प्राप्त होते हैं।

3. अनेक प्रकार के उद्योग व्यवसाय आदि वनस्पति पर ही निर्भर हैं चाय, कॉफी, तारपीन, कागज, दियासलाई आदि के उद्योग एवं व्यवसाय पादप एवं वनों पर ही आश्रित हैं।

4. पादपों में अनेक प्रकार की विधाएं होती है यह अनुकूल विकास आदि का परिणाम है। इन विभिन्नताओ का उपयोग अनेक प्रकार के प्रयोगों, संकरण, उप जातियों के विकास आदि में किया जाता है।

वनों का दुरुपयोग

बनो का सार्वजनिक दुरुपयोग मानव नहीं किया है उसने स्वार्थवस वनोन्मूलन वनोन्मूलन किया है। वन में पारितंत्र में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न करने में मनुष्य ही सर्वाधिक जिम्मेदार रहा है।

1. कृषि योग्य भूमि तैयार करना-: मानव ने कृषि हेतु भूमि तैयार करने के लिए अनेक बनो को नष्ट किया है जिससे पारितंत्र भी पूरी तरह असंतुलित हो गया है।

2. प्राकृतिक विपत्तियां-: अनेक प्रकार के प्राकृतिक विपत्तियां जैसे-: चक्रवात, आंधी, तूफान, बाढ़ आदि के कारण वनों को अत्यधिक क्षति पहुंचती है इन आपदाओं के कारण कई बार जंगलों में आग भी लग जाती है।

3. जनसंख्या वृद्धि एवं आवास स्थलों का विस्तार-: जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार के संसाधन एकत्रित करने तथा आवासीय स्थलों के निर्माण के लिए वनों को तीव्र गति से काटा जा रहा है।

4. इधन की आवश्यकता-: इंधन की मांग दिनोंदिन बढ़ने के कारण वृक्ष लगातार काटे जा रहे हैं।

5. कागज एवं फर्नीचर उद्योग एवं इसका विस्तार-: कागज निर्माण में बड़े स्तर पर लकड़ियों की लुगदी प्रयोग में लाई जाती है लकड़ी की आपूर्ति के लिए वनों को काटा जा रहा है इसी प्रकार अन्य उद्योगों जैसे फर्नीचर निर्माण एवं दियासलाई में भी लकड़ी का उपयोग होता है जो वनों से प्राप्त होती है।

6. पशुओं का चरना-: पशुओं के लिए चारे की उचित व्यवस्था न होने पर वे जंगलों में चराए जाते हैं जिससे वन नष्ट होते हैं।

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