ध्वनि,तरंग,तरंग गति की विशेषताएं ,तरंगों के प्रकार, प्रतिध्वनि का उपयोग

ध्वनि

जो कुछ हम अपने कानो द्वारा सुनते हैं दोहे निकल आता है दैनिक जीवन में हम विभिन्न प्रकार की दुल्हनियां सुनते हैं उदाहरण-: सड़क पर वाहनों के हॉर्न की आवाज, किसी पार्क में पक्षियों के कलरव (चहकने) की आवाज।

ध्वनि स्रोत

प्रत्येक कंपन करती वस्तु ध्वनि का एक स्रोत होती है जब किसी ध्वनि स्त्रोत को कंपित करते हैं तो वायु में विक्षोभ उत्पन्न होता है। जो एक नियत वेग से आगे बढ़ता जाता है तथा माध्यम का अपनी शाम्य में स्थिति के इधर-उधर कंपन करते हैं इस प्रकार विक्षोभ एक कान से दूसरे कान को स्थानांतरित होता जाता है यही विक्षोभ हमारे कानों तक तरंग के रूप में वायु में चलकर हमें सुनाई देता है।

प्रयोग

सिद्ध करना है कि ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है

कांच का एक जार लेकर उसमें वायु रोधी डॉट लगा देते हैं तथा यह निश्चित करते हैं कि जार में कहीं से भी वायु जाने का मार्ग नहीं है जार के अंदर एक विद्युत घंटी डालकर डॉट लगा देते हैं और उसके दोनों तारों को डॉट के बाहर एक बैटरी से जोड़ देते हैं जार को नीचे से एक वायु निकालने वाली पंप से संबंधित कर देते हैं प्रारंभ में जब जार में वायु है तो घंटी बजने पर उसकी ध्वनि सुनाई पड़ती है जब पंप से जार की वायु निकालनी प्रारंभ कर देते हैं तो घंटी की ध्वनि धीमी पड़ जाती है कुछ देर बाद जार में निर्वात होने पर घंटी की ध्वनि बिल्कुल सुनाई नहीं पड़ती अब जार में धीरे-धीरे वायु प्रवेश कराते हैं। घंटी की ध्वनि फिर सुनाई देने लगती है। इससे सिद्ध होता है कि ध्वनि निर्वात में होकर नहीं चल सकती अर्थात ध्वनि के लिए माध्यम की आवश्यकता है यह माध्यम ठोस द्रव अथवा गैस किसी भी रूप में हो सकता है।

तरंग

 माध्यम में तरंग अथवा विक्षोभ (हलचल) के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को तरंग गति कहते हैं।

तरंग गति की विशेषताएं

तरंग गति की निम्न विशेषताएं हैं।

(१) तरंग गति के माध्यम में खड़ा अपने हिसाब में स्थिति के दोनों और कंपन करते हैं।

(२) तरंग गति के कुछ समय पश्चात माध्यम में आगे वाले कणो में , माध्यम के पिछले वाले कणो जैसी ही गति पाई जाती है।

(३) तरंग गति के माध्यम में कोणों का स्थानांतरण नहीं होता , केवल ऊर्जा का स्थानांतरण होता है।

तरंगों के प्रकार

तिरंगे निम्नलिखित दो प्रकार की होती हैं।

(1) यांत्रिक तरंगे-: वह तरंगे जिनके संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है या अंतरिक तरंगे कहलाती हैं इस प्रकार की तरंगे ठोस द्रव अथवा गैसीय माध्यम में माध्यम के कणों उसके कंपन अथवा दोलनो के कारण संचित होती है उदाहरण-: वाद्य यंत्रों में लगे तार में उत्पन्न तरंगे , पानी के पृष्ठ पर उत्पन्न तरंगे इत्यादि।

(2) विद्युत चुंबकीय तरंगे-: वे तरंगे जिनके संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता नहीं होती तथा यह तरंगे निर्वात में भी संचरित (चल सकती हैं) हो सकती हैं। विद्युत चुंबकीय तरंगे कहलाती हैं। उदाहरण-: प्रकाश तरंगें, रेडियो तरंगे, X – किरणें, गामा किरणें इत्यादि। सभी चुंबकीय तरंगे प्रकाश के वेग से निर्वात अथवा वायु में  (चल)संचालित होती हैं‌।

यांत्रिक तरंगों के प्रकार

यांत्रिक तरंग दो प्रकार की होती है।

(1) अनुप्रस्थ तरंगे-: वे तरंगे जिनमें माध्यम के कण अपने माध्यम स्थितियों पर तरंग संचरण के लंबवत कंपन करते हैं अनुप्रस्थ तरंगे कहलाती हैं।

 उदाहरण-: यदि किसी डोरी के एक सिरे को किसी दीवार पर लगी कील अथवा हुक में बांध दिया जाए तथा डोरी को खींचकर तनी हुई अवस्था में उसकी लंबाई के लंबवत दिशा  में कंपन कराया जाए तो डोरी में उत्पन्न विक्षोभ दीवार की ओर से श्रंग अथवा गर्त के रूप में संचालित हो जाते हैं जबकि डोरी के कण आगे नहीं बढ़ते।

अनुप्रस्थ तरंगों के गुण

1. यह तरंगे केवल उन्हीं ठोस अथवा द्रवों की सतह पर उत्पन्न की जा सकती है जिनमें दृढ़ता होती है। 

2.यह तरंगे गैसों में उत्पन्न नही की जा सकती क्योंकि गैसों में दृढ़ता नहीं होती है।

(2) अनुदैर्ध्य तरंग-: वे तरंगे जिनमें माध्यम के कणों का कंपन, तरंग संचरण की दिशा के समांतर होता है अनुदैर्ध्य तरंगे कहलाती हैं। इन तरंगों में माध्यम के कण अपनी मध्य स्थिति के आगे पीछे दोलन करते रहते हैं तथा ध्वनि संपीड़न तथा विरल के रूप संचारित होती जाती है।

अनुदैर्ध्य तरंगों के गुण

1.यह तरंगे ठोस, द्रव, गैस तीनों अवस्थाओं में संचारित हो सकती हैं।

2.द्रवो के अंदर ध्वनि केवल अनुदैर्ध्य तरंगों के रूप में संचालित होती है

तरंगों से संबंधित कुछ परिभाषाएं

(1)साम्य स्थिति-: दोलन करने वाली वस्तु जिस बिंदु के इधर-उधर गति करती है उस बिंदु को उस बिंदु को साम्य स्थिति अथवा माध्य स्थिति कहते हैं।

(2) विस्थापन-: दोलन करने वाली किसी वस्तु की किसी क्षण साम्यावस्था से दूरी उस वस्तु का विस्थापन कहलाती है।

(3) आयाम-: किसी माध्यम में तरंग संचरित होने पर  कंपन करता हुआ कोई भी कण अपनी साम्यावस्था के दोनों ओर जितना अधिक से अधिक विस्थापित होता है उस दूरी को तरंग का आयाम कहते हैं।

(4) आवृत्ति-: कंपन करने वाले किसी कण द्वारा एक सेकंड में किए गए कंपनो की संख्या को उस कण की आवृत्ति कहते हैं।

(5) आवर्तकाल-: कंपन करने वाले किसी कण द्वारा एक कंपन पूरा करने में लगे समय को उस तरंग का आवर्तकाल कहते हैं। इसका SI  मात्रक सेकंड होता है।

प्रतिध्वनि -: किसी विस्तृत अथवा बड़े अवरोध से ध्वनि के परावर्तित होकर पुनः (दोबारा) सुने जाने की घटना को प्रतिध्वनि कहते हैं।

ध्वनि के स्रोत अथवा अवरोधक के बीच की न्यूनतम दूरी 17. 2 मीटर होनी चाहिए।

प्रतिध्वनि का उपयोग

प्रतिध्वनि का उपयोग ध्वनि की चाल ज्ञात करने, अल्ट्रासोनिक ग्राफी, समुंद्र की गहराई ज्ञात करने, समुद्र के अंदर बर्फ की चट्टाने अथवा पहाड़ी चट्टानों का पता लगाने, वायुयान की ऊंचाई ज्ञात करने आदि में किया जाता है।