जैव विविधता एवं वर्गीकरण:जीवो का नामकरण,वर्गीकरण की पद्धतिया,  वर्गीकरण की विभिन्न जगत प्रणालियां,जीवधारियों के चार जगत

जैव विविधता एवं वर्गीकरण

पृथ्वी पर अनेक प्रकार की जातियां के जीव उपस्थित हैं अभी तक लगभग 19 लाख जनता पर जातियों तथा लगभग 350005 प्रजातियों की खोज

वर्गीकरण

नए जीवो को पहचानना तथा इन्हें सही वैज्ञानिक नाम देना समान तथा असमान लक्षणों के आधार पर जीवों को अलग-अलग समूह अथवा वर्गों में रखना वर्गीकरण कहलाता है जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत वर्गीकरण एवं उसके मूल सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है वर्गीकरण विज्ञान कहलाता है।

वर्गीकरण की आवश्यकता-: मानव जाति के लिए विभिन्न जंतु एवं पादकों की उपयोगिता जानने के लिए उनका वर्गीकरण करना अत्यंत आवश्यक है जीव धारियों का वर्गीकरण इसके अध्ययन में निम्नलिखित रूप में सहायक होता है।

1.अध्ययन की सुविधा-: किसी वर्ग के एक जीवधारी के लक्षणों का अध्ययन करने से इसके अंतर्गत आने वाले सभी जंतुओं या पादकों के विषय में जानकारी मिल जाती है जैसे मेंढक का अध्ययन करने से एंफीबिया वर्ग के अन्य जंतुओं के सामान्य लक्षणों का भी ज्ञान हो जाता है।

2. विकास – क्रम का ज्ञान-: सभी समूहों के सामान्य लक्षणों का अध्ययन कर उन्हें जटिलता के आधार पर विकास के क्रम में रखा गया है उदाहरण प्रोटोजोआ, पोरिफेरा, ऐनेलिडा, और आर्थोपोडा को विकास के क्रम में नीचे से ऊपर की ओर रखा गया है। तथा कार्डेटा संघ के अंतर्गत मत्स्य, सरीसृप, पक्षी तथा स्तनधारी समूह का क्रम उनके गुणों की जटिलता के आधार पर निश्चित किया गया है अतः वर्गीकरण  से जीवो के विकास क्रम का ज्ञान हो जाता है।

3. नए जीवो की खोज-: जाति वृत्तीय तरीके से किए गए वर्गीकरण में कहीं-कहीं पर अज्ञात जीवो की कमी नजर आती है अतः वर्गीकरण की सहायता से वैज्ञानिक आज भी नए जीवो की खोज में प्रयत्नशील रहते हैं।

जीवो का नामकरण

सामान्य यह देखा जाता है कि एक ही जीव का साधारण नाम अलग-अलग देशों में यहां तक कि देश के अनेक राज्यों में अलग-अलग पाया जाता है जैसे गौरैया का नाम एक छोटा पक्षी इसे उत्तर भारत में गौरैया दक्षिण भारत में पिक्चचूका, इंग्लैंड में हाउस स्पैरो कहा जाता है।

द्विनाम पद्धति-: लीनियस ने पुस्तक सिस्टेमा नैचुरी के दसवें संस्करण (1758) में इसका वर्णन किया था। अपने महत्वपूर्ण योगदान के कारण इन्हें वर्गीकरण विज्ञान का जनक भी कहा जाता है। इस पद्धति के अनुसार प्रत्येक जीव के नाम के दो भाग होते हैं पहला भाग जीव के श्रेणी या वंश को प्रदर्शित करता है इसे जेनेरिक नाम कहते हैं तथा दूसरा भाग जीव की जाति को प्रकट करता है इसे स्पेसिफिक कहते हैं ।

जैसे-: घरेलू चिड़िया का वैज्ञानिक नाम पैसर डॉमेस्टिकस है जहां पैरस वंश को तथा डोमेस्टिकस जाति  को निरूपित करता है।

नामकरण के अंतरराष्ट्रीय नियम-: जीव जातियों के नामकरण हेतु लेनियस के द्विनाम पद्धति के अनुसार कुछ अंतरराष्ट्रीय नियमों को मान्यता दी गई जिससे प्रत्येक जाति का विश्व भर में एक ही नाम हो इसके अनुसार प्राणियों के नामकरण के कुछ सिद्धांत निम्नलिखित हैं

1. किसी भी प्राणी या पादप का वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा से व्युत्पन्न होना चाहिए।

2. वंश का नाम पहले तथा जाति का नाम बाद में आना चाहिए।

3. जीवो के वैज्ञानिक नाम को सदैव तिरछे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए हस्तलिपि के इन नामों के नीचे लाइन खींची जानी चाहिए।

4. अंग्रेजी में वंश के नाम का पहला अक्षर बड़ा और जाति के नाम का पहला अक्षर छोटा होना चाहिए।

वर्गीकरण की इकाइयां

लीनियस ने सर्वप्रथम लगभग एक समान जंतु जातियों के लिए श्रेणियां बनाकर सभी श्रेणियों को संरचनात्मक लक्षणों के आधार पर बांटा।

लीनियस में पूर्ण रुप से समान दिखने वाले जंतुओं को एक जाति में रखा जाति जीवो के उस समूह को कहते हैं जिनकी रचना स्वभाव व्यवहार आदि आपस में समान हो एवं समान गुणों वाली सभी जातियों को एक ही वंश में रखा और कुछ मूल लक्षणों में समानता वाले वर्गों को समान संघ में रखा।

 वर्गीकरण की पद्धतिया 

1.कृत्रिम पद्धति-: यह वर्गीकरण की सबसे सरलतम पद्धति है इसके अनुसार जंतुओं को उनके रंग-रूप, आकार आकृति आदि के आधार पर स्थलीय, जलीय तथा वायवीय श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है इसी प्रकार पादकों को आयु के आधार पर एक समूह में वर्गीकृत किया गया है।

2. प्राकृतिक पद्धति-: इस प्रकार के वर्गीकरण में एक समूह के जीव संरचना और प्राकृतिक विकास की दृष्टि से संबंधित होते हैं वर्तमान में इस पद्धति का प्रयोग अधिक किया जाता है।

3. जातिव्रतिय पद्धति-: वर्गीकरण की इस पद्धति में जीवो को उनके जातिगत विकास और आनुवंशिक लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

वर्गीकरण की विभिन्न जगत प्रणालियां

(1) दो जगत प्रणाली-: यह पद्धति लीनियस द्वारा सन 1758 में दी गई इस पद्धति में उन्होंने सभी जीवो को दो भागों जंतु एवं पादप जगत में विभाजित किया उन्होंने जगत जंतु जगत में सभी जंतुओं तथा पादप और जंतु तथा पादप जगत में सभी पादपों को रखा। 

(2) तीन जगत प्रणाली-: यह वर्गीकरण हेकल ने दिया था जिसमें जंतु व पादप के साथ प्रोटिस्टा को रखा गया।

(3) चार जगत प्रणाली-: यह वर्गीकरण कोप्लैंड ने दिया था जिसमें जगत मोनेरा को भी जोड़ा गया।

(4) पांच जगत प्रणाली-: यह वर्गीकरण अमेरिका के वैज्ञानिक आरएच व्हिटेकर ने सन 1969 में दिया।

जीवधारियों के चार जगत

(1) जगत प्रोटीस्टा-: इस जगत में अधिकांश जीव एक कोशिकीय जीव केंद्रीय होते हैं इसमें वास्तविक केंद्रक पाया जाता है जैसे-: अमीबा, यूग्लीना आदि।

(2) जगत पादप-: ये बहुकोशिकीय पादप होते हैं इनकी कोशिकाओं के चारों ओर सैलूलोज की कोशिकाओं की भित्ति पाई जाती है। यह प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपने भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं। और स्वपोषी होते हैं जैसे-: फर्न, शैवाल, बीज वाले पादप आदि।

(3) जगत कवक-: इस जगत के जीव बहुकोशिकीय सुखेंद्र एवं मृत्तोपरजीवी या परजीवी भी होते हैं इनमें कवक -जाल होता है इनमें काइटिंग द्वारा निर्मित कोशिका भित्ति पाई जाती है जैसे-: राइजोपस, पेनिसिलियम आदि।

(4) जगत जंतु-: यह सुकेंद्रीय बहुकोशिकीय  परपोषी जंतु होते हैं। इन में प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है तथा कोशिका भित्ति अनुपस्थित होती है जैसे मनुष्य, केचुआ, शेर, मछली, सांप आदि।

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