उत्पादन एवं उपभोक्ता में संबंध

विनिमय-: परिभाषा-: दो पक्षों के मध्य होने वाले ऐच्छिक, वैधानिक एवं पारंपरिक धन के हस्तांतरण को विनिमय कहते है।

विनिमय का अर्थ वस्तु या सामान का आदान प्रदान करना होता है।

विनिमय की विशेषताएं या लक्षण-: विनिमय के लक्षण विशेषताएं निम्न है।

1. विनिमय के लिए दो या दो से अधिक पक्षों का होना आवश्यक है। अकेला व्यक्ति विनिमय (आदान प्रदान) नहीं कर सकता।

2. विनिमय करने वाली दोनों पक्षों के पास अलग-अलग प्रकार की वस्तुएं होनी चाहिए एक ही प्रकार की वस्तुओं का विनिमय नहीं हो सकता।

3. विनिमय क्रियाओं में वस्तुओं व सेवाओं या धन का हस्तांतरण ऐच्छिक होता है इसमें किसी प्रकार का दबाव नहीं होता है।

4. विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ होना चाहिए दान तथा भेट द्वारा केवल एक ही पक्ष को ही लाभ मिलता है अतः वह विनिमय नहीं कहलाता।

विनिमय प्रणाली के प्रकार

विनिमय प्रणाली दो प्रकार की होती है।

1. वस्तु विनिमय या अदल – बदल विनिमय प्रणाली।

2. मुद्रा विनिमय या क्रय – विक्रय विनिमय प्रणाली।

विनिमय के लाभ या महत्व

1. कौशल विकास- जब श्रमिकों द्वारा एक ही कार्य बार बार किया जाता है तो वह इस कार्य में निपुण हो जाते हैं अतः श्रम विभाजन के अंतर्गत श्रमिकों की कुशलता में वृद्धि होती है।

2. संयुक्त लाभ-विनिमय प्रक्रिया द्वारा व्यक्तियों या राष्ट्र का कम महत्वपूर्ण वाली वस्तुओं के बदले अधिक महत्व वाली वस्तुएं प्राप्त होती हैं इस प्रकार विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ होता है।

3. विस्तृत बाजार पहुंच- विनिमय ने बाजारो के क्षेत्र को अधिक बढ़ा दिया है सबसे पहले बाजार एक ही स्थान पर होते थे किंतु अब बाजार प्रांतीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय हो गए हैं।

4. संतुष्टि में वृद्धि- विनिमय के द्वारा व्यक्ति को अपनी आवश्यकता की वस्तुएं पर आसानी से प्राप्त हो जाती हैं जिनका उपयोग करके वह संतुष्टि प्राप्त करता है।

5. उन्नत जीवन स्तर- विनिमय प्रक्रिया द्वारा व्यक्तियों को अपनी आवश्यकता की वस्तुएं प्राप्त हो जाते हैं अतः उनके रहन-सहन के स्तर में भी उन्नति होती है।

विनिमय से हानियां-:

1. अति आदान-प्रदान से मंदी का भय- विभिन्न देशों के उत्पादकों द्वारा वस्तुओं का उत्पादन बेहद स्तर पर किए जाने पर अति उत्पादन का भय उत्पन्न हो जाता है इससे मंदिर उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है वर्ष 1929 – 33 की विश्वव्यापी मंदी को इसी रूप मे देखा जा सकता है।

2. राजनीति निर्भरता-इसके अंतर्गत शक्तिशाली देश कमजोर देशों की विदेशी व्यापार पर अपना अनुचित प्रभाव स्थापित कर लेते हैं और इस प्रकार वह उस राष्ट्र के संघर्षों का उपयोग कर अपने लाभ के लिए करने लगते हैं। जिस प्रकार इंग्लैंड कच्चा माल बारिश से ले जाता था और अपने यहां तैयार माल भारत में बेचता था।

3. प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन- जब एक राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र को श्रम पर निर्भर बना देता है तो वह वहां के संसाधनों का अनुचित रूप से शोषण करने लगता है। इससे संसाधन का हार्ष होना आरंभ हो जाता है और आर्थिक हानि होने लगती है।

4. आर्थिक निर्भरता-विनिमय प्रक्रिया द्वारा एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रपति की प्राप्ति के लिए निर्भर हो जाता है इस प्रकार की स्थिति संकट काल में कुछ राष्ट्रों के लिए बड़ी हानिकारक हो सकती है।

5. वैश्विक संघर्ष की संभावना-एक राष्ट्रीय दूसरे राष्ट्र की में बाजार प्राप्त करने की होड़ कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच में युद्ध की संभावना को भी प्रबल कर देती है जिससे दोनों राष्ट्रों (देशों) को हानि पहुंचती है।

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