अध्यावरणी तंत्र :त्वचा या अध्यावरण, त्वचा के व्युत्पन, त्वचा के कार्य

अध्यावरणी तंत्र

आध्यावरणी तंत्र के अंतर्गत त्वचा तथा इसके व्युत्पन्न आते हैं। सभी कशेरूकी जंतुओं के शरीर पर मोटा आवरण होता है जिसे  देह भित्ति कहते हैं इसी देह भित्ति के बाहरी स्तर को त्वचा अथवा आध्यावरण कहते है।

त्वचा या अध्यावरण

मानव की त्वचा पतली शुष्क तथा रोम युक्त होती है तथा यह वसीय ऊतको द्वारा पेश स्तर से जुड़ी होती है। त्वचा मानव अध्यावरण तंत्र का सबसे बड़ा तथा मानव शरीर का प्रमुख स्पर्श संवेदी अंग है मानव त्वचा मुख्य  दो प्रकार की होती है।

अधिचर्म या उपचर्म-: अधिचर्म की उत्पत्ति भ्रुण के वाहय जनन स्तर से होती है यह त्वचा की सबसे बाहरी परत होती है तथा बाहर से अंदर की ओर निम्न वर्गों में विभाजित होती है।

1. किण स्तर-: यह अधिचर्म की सबसे बहार की ओर पाई जाने वाली उप परत  है। जो मृत कोशिकाओं की बनी होती है यह कोशिकाएं चपटी, किरैटिन  युक्त तथा जल रोधी होती है। यह परत समय-समय पर शरीर से निर्मोचित  होती रहती है।

2. स्वच्छ स्तर-: यह स्तर किण स्तर के ठीक नीचे पाया जाता है यह भी मृत तथा चपटी कोशिकाओं का बना होता है परंतु इन कोशिकाओं की मोटाई किण स्तर की कोशिकाओं से ज्यादा होती है तथा यह स्तर 3 से 5 कोशिकीय परतो से बना होता है।

3. कणि स्तर-: यह वह पतला स्तर है जो हमारी त्वचा को सूखने से बचाता है इसकी कोशिकाएं चपटी तथा कैरोटोहायलिन प्रोटीन के कारण कणिकामय होती है।

चर्म-: चर्म की उत्पत्ति भ्रूण के मध्य जनन स्तर से होती है यह परत अधि चर्म के ठीक नीचे पाई जाती है। यह अधि- चर्म की तुलना में दो से 3 गुना मोटी होती है। तथा इसका निर्माण तंतुमय संयोजी ऊतकों से होता है इसमें अनेक प्रकार की ग्रंथियां, रोम कालैजन तंतु पाए जाते हैं इस स्तर के नीचे स्थित बसीय ऊतक इसे पेशियों से जोड़कर रखते हैं। यह शरीर की वाहय आघात से रक्षा करते हैं।

त्वचा के व्युत्पन

1. बाल-: बाल उपचार व उपचार के भी उत्पन्न होते हैं व्युत्पन्न होते हैं शरीर पर बालों का पाया जाना स्तनधारियों का एक मुख्य लक्षण है वालों का वह भाग जो त्वचा के भीतर स्थित होता है बाल की जड़ कहलाता है यह जड़ रोम पुटिका में बंद रहती है।

2. त्वचीय ग्रंथिया-: इसका निर्माण अधिचर्म के अंकुरण स्तर से होता है। यह वाहय स्रावी ग्रंथियां होती हैं जो बनने के बाद चर्म में धस जाती है। 

त्वचा के कार्य

1. शरीर की सुरक्षा-: त्वचा शरीर के भीतर स्थित सभी ऊतको, अंगों आदि को पूर्णतया ढककर उनकी सुरक्षा करती है यह रोगाणुओं तथा रसायनों को शरीर के अंदर प्रवेश करने से रोकती है साथ ही शरीर के कोमल आंतरिक अंगों को रगड़ व चोट से बचाती है।

2. ताप नियंत्रण एवं उत्सर्जन-: मानव समतापी प्राणी है शरीर के ताप नियमन में त्वचा का महत्वपूर्ण योगदान होता है मानव त्वचा मौसम अनुसार ताप नियमन में सहायक होती है ग्रीष्म ऋतु में त्वचा में उपस्थित स्वेद ग्रंथियां के कारण हमारे शरीर से पसीना ज्यादा निकलता है इसके वाष्पीकरण से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है पसीने में यूरिया, यूरिक अम्ल, अमोनिया, फास्फोरस तथा क्लोराइड्स आदि उत्सर्जित पदार्थों के रूप में होते हैं।

3. अवशोषण-: त्वचा जल एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर के अंदर नहीं जाने देती है परंतु कुछ उपयोगी पदार्थों जैसे दवाइयों का अवशोषण भी करती है।

4. स्तन ग्रंथियां-: मादा में स्तन ग्रंथिया शिशु जन्म के बाद दुग्ध श्रावण करती हैं जो नवजात का  मुख्य पोषण होता है।

5. समस्थापन-: त्वचा  ताप नियमन, जल नियमन आदि द्वारा शरीर के अंतः वातावरण को संतुलित रखते है।

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